Message
SSHF Message

Message from President
SSH Foundation
Mrs Barkha Sinha:

“ The development of society on spiritual basis and in universal interest without damaging the environment is an arduous task. We embark upon the development invoking spiritual elevation and mass welfare please Protect the environment and combat all the forces which dull the process of social service altruistic vehemence”
Thanks

“आध्यात्मिक आधार पर सर्वहित में समाज का विकास बिना पर्यावरण को छति पहुँचाये एक दुःसाध्य कार्य है हमलोग विकास के लिए आध्यात्मिक उध्यान एवं सर्व कल्याण के कार्य में लगे है कृपया पर्यावरण बचाये और ऐसी हर ताकत का विरोध करे जो परहित उत्साह एवं समाज सेवा की प्रक्रिया को धीमा करते है”
धन्यवाद


Message from Vice-President
SSH Foundation
Mrs Niharika Anand :

“Our trust is a Concrete foundation for spiritual and social progress “

“हमारा न्यास आध्यात्मिक एवं सामाजिक तरक्की की एक मजबूत नीव है ”

Mr Shiv Kumar Vishwakarma:

“ Let the wheel of spiritual upliftment and cosmic interest moving ”

आध्यात्मिक उत्थान एवं सार्वभौमिक हित के चक्र को घुमते रहने दीजिये|

Secretary’s message
Mr Indra Bhushan Singh

“ Lord Shiva as a cosmic teacher is prevailing among common masses. The beauty of his presence beautifies life and character. So, the trust is working in this regard and social welfare”

“ जगत गुरु के रूप में भगवान शिव की व्याप्ति आप जन मानस में हो रही है| इनके उपस्तिथि की सुंदरता जीवन एवं चरित्र को सुन्दर बनाती है| इसलिए न्यास इस दिशा में तथा समाज कल्याण के क्षेत्र में कार्य कर रहा है | ”

Message from the Treasures
Mr Ram Deo sah


“ It is the people who assess the work done by a trust and we work for the people to improve their lot. Needless to say philanthropically and spiritually.”

“ये लोग होते है जो किसी न्यास के लिए एक कार्य का आकलन करते है और हमलोग की बहुत सारी स्थितियों में सुधार लाने के लिए कार्य करते है | कहने की आवश्कता नहीं की मानव प्रेम में और आध्यात्मिक तौर पर|”

भारतीय अध्यात्म के सिंहावलोकन से स्पष्ट होता है कि महेवर शिव चिरकाल से आदिगुरू एवं गुरू पद पर अवस्थित हैं। ग्रंथो में शिव के िा?्षयों"प्रिा?्षयों का नामोल्लेख मिलता है। पुरातन काल से शिव को रूद्र, पाुपति, ईवर, मृत्युंजय, देवाधिदेव, महाकाल, महेवर, जगतगुरू आदि उपाधियों से विभूषित किया गया है। उनके विभिन्न स्वरूपों की पूजा"अचर्ना का अविरल प्रवाह सर्वाधिक लोकपि्रय होता आया है।

चन्दा मामा सबके मामा और शिव ?ार"?ार के बाबा हो गये। देवताओं के अधिपति, असुरों के आराध्य, योगियों के योगीवर, अ?ाोरियों के अ?ाोरेवर, तांत्रिक के महाकौेलेवर, कापालिकों के कपालेवर, गृहस्थेां के उमा"महेवर एवं निहंगों के माानी शिव के बहुआयामी व्यक्तित्व का लोक"चेतना पर अक्षुण प्रभाव है। शिव समस्त विसंगतियों में संगति की स्थापना हैं। हम आप यदि विले?्षाणात्मक दृ?ि्षट डालें तो विस्मय होगा कि शिव के विभिन्न स्वरूपों को अपनी पूर्णता में प्रसि़िद्ध प्राप्त हुई है किन्तु सदाशिव , दक्षिणामूर्ति और पंचानन की महिमा से मंडित उनका ज्ञान दाता स्वरूप जन"सामान्य में प्रति?ि्षठत नहीं हुआ है।

परमात्मा को शिव सम्बोधित किया गया है। सूक्ष्मातिसूक्ष्म परम चैतन्यात्मा को ही ईवर, परमेवर, शिव , परमात्मा अथवा आत्मा आदि ाब्दों से विभूषित किया गया है। निराकार या साकार शिव की महिमा में प्रयुक्त सभी उपाधियांॅं महेवर पद को इंगित करती हैं एवं उसी का वाच्य हैं। महेवर को प्रथमगुरू एवं आदिगुरू कहा गया है। शिव का गुरू स्वरूप ग्रन्थों में वंदे विघातीथर्ं महेवरमे`, ाम्भवे गुरवे नमः,गुरूणां गुरवे नमः तथा तुम त्र्भिुवन गुरू वेद बखाना की पंक्तियों से प्रदीप्त है किन्तु केवल वैचारिक तल पर हैं । शिव के विभिन्न स्वरूपों की पूजा का कि्रयात्मक पक्ष दृ?ि्षटगोचर है लेकिन उनके गुरू स्वरूप् से यथाथर् में जुड़ाव की व्याप्ति नही है। परमदानी"अवढ़रदानी शिव की ?ार.?ार मे पूजा, मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु दुर्गम"सुगम मंदिरों की यात्र, संकट निवारणाथर् महामृत्यंुजय का जप, महाकाल, महारूद्र, और भूतनाथ की रौद्र रूप में अभ्यथर्ना, पथिर्व शिव लिंग पूजन, शिव परिवार की स्वतंत्र् एवं सम्मिलित आराधना, रूद्राभि?्षोक आदि शिव के विभिन्न स्वरूपों से सानिध्य"लाभ के विपुल दृ?ि्षटान्त हैं। शिव से शिष्य के रूप में ज्ञानाजर्न करने वालों की संख्या अपेक्षाकृत नगण्य है। निवतर्मान काल में लोगों ने शिव को अपना गुरू मानकर अनुपम ख्याति प्राप्त की है किन्तु अनजाने कारणांे से दूसरों को शिव गुरू का शिष्य होने के लिए प्रेरित नहीं किया है।

गुरू अपने शिष्य के व्यक्तित्व के सवोर्तम पक्ष को उजागर करते हैं और परम चेतना से उसका ऎक्य सुनििचत करते है। महेवर शिव को भी अपने शिष्य के अविकसित ज्ञान के स्तर पर आकर उसे पूर्ण ज्ञान की स्थिति में ले जाना होता है। शिव रूपी ज्ञान से संजात एक सामान्य भावाचरण भी जगत के लिए अनुकरणीय प्रमाणित होता है। यथा, साकार शिव परिवार में शिव अभिज्ञान की एक अभिव्यक्ति का चित्र्ण द्र?्षटव्य है। चित्र्ति साकार शिव परिवार में जन्मजात प्रतिकूल प्रवृति वाले पाु"पक्षियों भी सहज प्रेम हैं। बा?ा और बैल, सॉंप और चूहा, मोर और सपर् परस्पर विपरीत प्रवृतियों के धारक हैं पर शिव भावान्तर्गत आपसी प्रेम की प्रतिमूर्ति हैं। सचमुच शिव भाव के िाखर की तलहटी में ही समस्त संकीर्णताएॅं तिरोहित हो जाती हैं। .

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